मोहर्रम क्यों मनाया जाता है? करबला का इतिहास जानिए हिन्दी में

इस्लाम धर्म में मनाए जाने वाले सभी त्योहारों में से मोहर्रम भी एक प्रमुख त्योहार है . मोहर्रम इस्लामिक वर्ष हिजरी का पहला महीना है । इस त्योहार को रोजा रखा जाता है , इबादत की जाती और कई जगह आशुरे के दिन पुरे बस्ती में खिचड़ी बाटा जाता है , ताजिया बनाया जाता है ।

हिजरी वर्ष का आरंभ इसी महीने से होता है। इस माह को इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शुमार किया जाता है। अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने इस मास को अल्लाह का महीना कहा है। साथ ही इस मास में रोजा रखने की खास अहमियत बयान की है। आइए हम आपको को बताते हैं कि मोहर्रम क्यों मनाया जाता है? करबला का इतिहास जानिए हिन्दी में

मोहर्रम क्या है ? what is muharram?

मोहर्रम इस्लामी वर्ष यानी हिजरी का पहला महीना मोहर्रम है इस्लामी कैलेंडर के अनुसार इस्लाम में नया साल की शुरुवात मोहर्रम के महीने से होती है और अखरी महीना ज़ु अल-हज्जा को खत्म हो जाता है। हिंदी Quotes पढ़ने के लिए क्लिक करें

मोहर्रम क्यों मनाया जाता है ?

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के याद में दुनिया भर में मोहर्रम मनाया जाता है. इसी महीने में यानी 10 वे दिन जिसे आशूरा का दिन कहा जाता है .आशूरा के दिन ही हजरत मोहम्मद ﷺ के नवासे ( नाती) इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके 72 साथियों के साथ करबला में यजीद पलीद ने शहीद कर दिया गया था।

मोहर्रम
मोहर्रम

करबला का इतिहास जानिए हिन्दी में Know the history of Karbala in Hindi

जब इस्लाम में खिलाफत यानी खलीफा का राज था। ये खलीफा पूरी दुनिया के मुसलमानों का प्रमुख नेता होता था। पैगंबर साहब की वफात के बाद चार खलीफा चुने गए थे। लोग आपस में तय करके इसका चुनाव करते थे।

इसके लगभग 50 साल बाद इस्लामी दुनिया में घोर अत्याचार का दौर आया, मक्का से दूर सीरिया के गर्वनर यजीद ने खुद को खलीफा घोषित कर दिया, उसके काम करने का तरीका बादशाहों जैसा था, जो उस समय इस्लाम के बिल्कुल खिलाफ था, तब इमाम हुसैन ने यजीद को खलीफा मानने से इनकार कर दिया।

इससे नाराज यजीद ने अपने राज्यपाल वलीद पुत्र अतुवा को फरमान लिखा, ‘तुम हुसैन को बुलाकर मेरे आदेश का पालन करने को कहो, अगर वो नहीं माने तो उसका सिर काटकर मेरे पास भेजा जाए

राज्यपाल ने हुसैन को राजभवन बुलाया और उनको यजीद का फरमान सुनाया। इस पर हुसैन ने कहा- ‘मैं एक व्याभिचारी, भ्रष्टाचारी और खुदा रसूल को न मानने वाले यजीद का आदेश नहीं मान सकता।’ इसके बाद इमाम हुसैन मक्का शरीफ पहुंचे, ताकि हज पूरा कर सकें।

वहां यजीद ने अपने सैनिकों को यात्री बनाकर हुसैन का कत्ल करने के लिए भेजा। इस बात का पता हुसैन को चल गया और लेकिन मक्का ऐसा पवित्र स्थान है, जहां किसी की भी हत्या हराम है।

इसलिए उन्होंने खून-खराबे से बचने के लिए हुसैन ने हज के बजाय उसकी छोटी प्रथा उमरा करके परिवार सहित इराक चले आ गए। मुहर्रम महीने की दो तरीख 61 हिजरी को हुसैन अपने परिवार के साथ कर्बला में थे,

नौ तारीख तक यजीद की सेना को सही रास्ते पर लाने के लिए समझाइश देते रहे, लेकिन वो नहीं माने। इसके बाद हुसैन ने कहा- ‘तुम मुझे एक रात की मोहलत दो..ताकि मैं अल्लाह की इबादत कर सकूं’ इस रात को ‘आशुर की रात’ कहा जाता है, गले दिन जंग में हुसैन के 72 साथिया मारे गए।

तब सिर्फ हुसैन अकेले रह गए थे, लेकिन तभी अचानक खेमे में शोर सुना, उनका छह महीने का बेटा अली असगर प्यास से बेहाल था। हुसैन उसे हाथों में उठाकर मैदान-ए-कर्बला में ले आए। उन्होंने यजीद की फौज से बेटे को पानी पिलाने के लिए कहा, लेकिन फौज नहीं मानी और बेटे ने हुसैन की हाथों में तड़प कर दम तोड़ दिया।

इसके बाद भूखे-प्यासे हजरत इमाम हुसैन का भी कत्ल कर दिया। हुसैन ने इस्लाम और मानवता के लिए अपनी जान कुर्बान की थी। इस इसे आशुर यानी मातम का दिन कहा जाता है, इराक की राजधानी बगदाद के दक्षिण पश्चिम के कर्बला में इमाम हुसैन और इमाम अब्बास के तीर्थ स्थल हैं। स्रोत

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